आज का विचार

जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमे रसधार नहीं वो ह्रदय नहीं वह पत्थर है, जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

जरा गौर करे 

जब कोई दवा सकारात्मक प्रभाव दिखाती है तो डॉक्टर कहते है की दवा रेस्पोंस (Response) कर रही है और जब कोई दवा नकारात्मक प्रभाव दिखाती है तो डॉक्टर कहते है कि दवा रेअक्ट (React) कर रही है ।


इसलिए 
रेस्पोंसिव (Responsive) बनिए,   न कि रेअक्टिव (Reactive)


अजीत झा 
आज हम पश्चिम की ओर भाग रहे है पर यह भूल गए है कि __________

सूर्य हमेशा पश्चिम में ही डूबता है । 

अजीत झा 


एक वाक्य जो गम में ख़ुशी और ख़ुशी में गम का एहसास कराती हो---

'' यह वक्त भी गुजर जायेगा ''

अजीत झा 
आप क्या सोचते है मैं और हम के विषय में 


जरा इस पर भी सोचे

ILLNESS
WELLNESS


अजीत झा 

बुधवार, 25 अप्रैल 2012


दोहे 
गोपाल दास नीरज


वाणी के सौन्दर्य का शब्दरूप है काव्य
किसी व्यक्ति के लिए है कवि होना सौभाग्य।



जिसने सारस की तरह नभ में भरी उड़ान
उसको ही बस हो सका सही दिशा का ज्ञान।



जब तक पर्दा खुदी का कैसे हो दीदार
पहले खुद को मार फिर हो उसका दीदार।



जिसमें खुद भगवान ने खेले खेल विचित्र
माँ की गोदी से अधिक तीरथ कौन पवित्र।



कैंची लेकर हाथ में वाणी में विष घोल
पूछ रहे हैं फूल से वो सुगंध का मोल।



दिखे नहीं फिर भी रहे खुशबू जैसे साथ
उसी तरह परमात्मा संग रहे दिन रात।



मिटे राष्ट्र कोई नहीं हो कर के धनहीन
मिटता जिसका विश्व में गौरव होता क्षीण।



इंद्रधनुष के रंग-सा जग का रंग अनूप
बाहर से दीखे अलग भीतर एक स्वरूप।
धरा को उठाओ
गोपाल दास नीरज


दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ।

बहुत बार आई गई यह दीवाली
मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल बुझी पर अभी तक
कफ़न रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे,
उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ।
दिये से मिटेगा न मन का अँधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ।

सृजन शांति के वास्ते है ज़रूरी
कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाए,
तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा
कि जब प्यार तलवार से जीत जाए,
घृणा बढ़ रही है, अमा चढ़ रही है,
मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ।
दिये से मिटेगा न मन का अँधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ।

बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के
न वह बंद रहती किसी के भवन में,
किया कैद जिसने उसे शक्ति बल से
स्वयं उड़ गया वह धुँआ बन पवन में,
न मेरा-तुम्हारा, सभी का प्रहर यह
इसे भी बुलाओ, उसे भी बुलाओ।
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ।

अगर चाहते तुम कि सारा उजाला
रहे दास बनकर सदा को तुम्हारा,
नहीं जानते कि फूस के गेह में पर
बुलाता सुबह किस तरह से अंगारा,
न फिर कोई अग्नि रचे रास इससे,
सभी रो रहे आँसुओं को हँसाओ।
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ।


खग उड़ते रहना जीवन भर
गोपाल दास नीरज 



खग! उड़ते रहना जीवन भर!
भूल गया है तू अपना पथ,
और नहीं पंखों में भी गति,
किंतु लौटना पीछे पथ पर अरे, मौत से भी है बदतर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर!

मत डर प्रलय-झकोरों से तू,
बढ़ आशा-हलकोरों से तू,
क्षण में यह अरि-दल मिट जाएगा तेरे पंखों से पिसकर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर!

यदि तू लौट पड़ेगा थक कर,
अंधड़ काल-बवंडर से डर,
प्यार तुझे करने वाले ही देखेंगे तुझको हँस-हँसकर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर!

और मिट गया चलते-चलते,
मंज़िल पथ तय करते-करते,
तेरी खाक चढ़ाएगा जग उन्नत भाल और आँखों पर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर! 

छिप छिप अश्रु बहाने वालों 



गोपाल दास नीरज

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों!
मोती व्यर्थ लुटाने वालों!
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है? नयन सेज पर,
सोया हुआ आँख का पानी,
और टूटना है उसका ज्यों,
जागे कच्ची नींद जवानी,
गीली उमर बनाने वालों! डूबे बिना नहाने वालों!
कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गई तो क्या है,
खुद ही हल हो गई समस्या,
आँसू गर नीलाम हुए तो,
समझो पूरी हुई तपस्या,
रूठे दिवस मनाने वालों! फटी क़मीज़ सिलाने वालों!
कुछ दीपों के बुझ जाने से आँगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर,
केवल जिल्द बदलती पोथी।
जैसे रात उतार चाँदनी,
पहने सुबह धूप की धोती,
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार कश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गंध फूल की,
तूफ़ानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफ़रत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है!

बादल

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' 
सखी,
बादल थे नभ में छाये
बदला था रंग समय का
थी प्रकृति भरी करुणा में
कर उपचय मेघ निश्चय का।।

वे विविध रूप धारण कर
नभ तल में घूम रहे थे
गिरि के ऊँचे शिखरों को
गौरव से चूम रहे थे।।

वे कभी स्वयं नग सम बन
थे अद्भुत दृश्य दिखाते
कर कभी दुंदुभी वादन
चपला को रहे नचाते।।

वे पहन कभी नीलांबर
थे बड़े मुग्ध कर बनते
मुक्तावलि बलित अघट में
अनुपम वितान थे तनते।।

बहुश: खंडों में बँटकर
चलते फिरते दिखलाते
वे कभी नभ पयोनिधि के
थे विपुल पोत बन पाते।।

वे रंग बिरंगे रवि की
किरणों से थे बन जाते
वे कभी प्रकृति को विलसित
नीली साड़ियाँ पिन्हाते।।

वे पवन तुरंगम पर चढ़
थे दूनी दौड़ लगाते
वे कभी धूप छाया के
थे छविमय दृश्य दिखाते।।

घन कभी घेर दिन मणि को
थे इतनी घनता पाते
जो द्युति विहीन कर, दिन को
थे अमा समान बनाते।।

आँख का आँसू
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
आँख का आँसू ढ़लकता देखकर
जी तड़प कर के हमारा रह गया
क्या गया मोती किसी का है बिखर
या हुआ पैदा रतन कोई नया

ओस की बूँदें कमल से है कहीं
या उगलती बूँद है दो मछलियाँ
या अनूठी गोलियाँ चांदी मढ़ी
खेलती है खंजनों की लड़कियाँ

या` जिगर पर जो फफोला था पड़ा
फूट कर के वह अचानक बह गया
हाय` था अरमान, जो इतना बड़ा
आज वह कुछ बूँद बन कर रह गया।।

पूछते हो तो कहो मैं क्या कहूँ
यों किसी का है निराला पन भया
दर्द से मेरे कलेजे का लहू
देखता हूँ आज पानी बन गया

प्यास थी इस आँख को जिसकी बनी
वह नहीं इस को सका कोई पिला
प्यास जिससे हो गयी है सौगुनी
वाह क्या अच्छा इसे पानी मिला

ठीक कर लो जाँच लो धोखा न हो
वह समझते हैं सफर करना इसे
आँख के आँसू निकल करके कहो
चाहते हो प्यार जतलाना किसे

आँख के आँसू समझ लो बात यह
आन पर अपनी रहो तुम मत अड़े
क्यों कोई देगा तुम्हें दिल में जगह
जब कि दिल में से निकल तुम यों पड़े

हो गया कैसा निराला यह सितम
भेद सारा खोल क्यों तुमने दिया।
यों किसी का है नही खोते भरम
आँसुओं तुमने कहो यह क्या किया
 


मातृभाषा के प्रति
-भारतेंदु हरिश्चंद
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।
लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।

सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

-भारतेंदु हरिश्चंद्र

सोमवार, 12 मार्च 2012

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 
अधर धर मुरली बजैया की
आरती कृष्ण  कन्हैया की
श्याम तुम मथुरा जन्म लियो
गोकुल में मंगलाचार कियो
आरती कृष्ण  कन्हैया की | अधर धर.......
श्याम तुम यशोदा के छलिया 
श्याम बलिदाऊ के भईया
वन वन गाय चरैया की
आरती कृष्ण  कन्हैया की | अधर धर.......
श्याम तुम कंसासुर  मारो 
भूमि को भार उतार डारो
 कालिया नाग नथैया की
आरती कृष्ण  कन्हैया की | अधर धर.......
श्याम तुम अर्जुन के प्यारे 
श्याम भक्तो के रखवारे
छमाछम रास रचैया की
आरती कृष्ण  कन्हैया की | अधर धर.......
आरती गाते गीतानंद की मन को  होता बड़ा आनंद
द्रौपदी लाज बचैया की 
द्रौपदी चीर बढ़ैया की
आरती कृष्ण  कन्हैया की | अधर धर.......

गोविन्द मेरो हैं  गोपाल मेरो हैं 
श्री बांके बिहारी नन्दलाल मेरो हैं ।



गुरुवार, 2 जून 2011

आखिर कहाँ जा रहे है हम

आखिर कहाँ जा रहे है हम
अजीत कुमार झा

तकनीकों के प्रयोग से जीवन बना सरल
पर संबंधों  के निर्वहन में मानव हुआ विफल | 
हँसने के लिए चाहिए अब टीवी का सहारा
शो ख़त्म हुआ और गायब हंसी हमारा |
ऑरकुट फेसबुक में दुनिया गयी सिमट
रिश्ते नाते आस पड़ोस के हो गए अब विकट |
इन्टरनेट ने ग्लोबल विलेज की कल्पना को किया साकार
अपना गाँव और शहर जाना अब हुआ दुश्वार |
तकनीकों के अंध प्रयोग से मशीनी मानव बन गए हम
आगे बढ़ने की होड़ में सबसे कट कर रह गए हम |
ऑफिस से घर पहुँचते स्वयं हाथ टी वी पर चला जाता है
अपनों से दो बातें करने का समय भी नहीं मिल पाता है |
शुभकामनायें भेजने का नया तरीका हुआ ईजाद
बस मैसेज फॉरवर्ड करो लिखने की नहीं है बात |
दूरदर्शन और मोबाइल से बढ गयी नजदीकियां 
रिश्ते नाते और चिट्ठियों से बढ गयी है दूरियां  |
वक्त है अभी भी 'अजीत' संभला जाय
बाद में पछताना पड़े ऐसी नौबत न आने पाए |

अजीत कुमार झा
पुस्तकालयाध्यक्ष





शनिवार, 28 मई 2011


आस का मंदिर



प्रथम प्रस्फुटित नव किरण की आस में
बिखरी चांदनी के सहवास मे
धैर्य व विश्वास के साथ मे
एक नया कदम मंजिल की ओर बढायें
स्नेहीजनों का हाथ लेकर हाथ में


जैसे संवर जाती है तक़दीर शिल्पकार के हाथ से
बंधकर अटककर टूटकर उड़ती है पतंग निश्चल भाव से
रात जाती है इक नव प्रभात की आस में
जिन्दगी के अर्श पर मजबूरियों के फर्श पर
धैर्य कभी कम न हो मुश्किलों को देख कर
इक नया कदम बढ़ाएं अंधियारों को चीरकर


अगर चाहते हो जीवन में सही दिशा का ज्ञान
बन कर सारस नभ मे भरो उड़ान
याद हमेशा रखना 'अजीत' कि यह वाणी
कुछ तारो के टूटने से आसमान होता नहीं खाली

भूत को बिसार के भविष्य को संवारें हम
वर्तमान का कर उपयोग जीवन को बनाये हम
काँटों की सेज से पुष्प को चुन चले
एक स्वाति कि बूंद से मन को तृप्त करे
याद रखे हमेशा यह, आनंद यात्रा में है
गंतव्य पहुचने में नहीं,
हमारा कर्तव्य कर्म करने में है फल की चाह मे नहीं

मन मे उजियारा भर, आस का मंदिर बनायें
सहज सरल इस जीवन में उच्च विचार फैलाए
मनुज मनुज में हो प्यार फैले सुगंध संसार
आओ मिल जुल कर इस जहाँ को स्वर्ग बनायें

अजीत कुमार झा

शुक्रवार, 27 मई 2011

कोशिश करने वालों की - हरिवंशराय बच्चन

कोशिश करने वालों की






कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,


नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,


चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।


मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,


चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।


आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,


कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।


डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,


जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।


मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,


बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।


मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,


कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।


असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,


क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।


जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,


संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।


कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,


कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती


- हरिवंशराय बच्चन


क्षमा- अज्ञात

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल


सबका लिया सहारा

पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे

कहो, कहाँ कब हारा ?



क्षमाशील हो रिपु-समक्ष

तुम हुये विनीत जितना ही

दुष्ट कौरवों ने तुमको

कायर समझा उतना ही।



अत्याचार सहन करने का

कुफल यही होता है

पौरुष का आतंक मनुज

कोमल होकर खोता है।



क्षमा शोभती उस भुजंग को

जिसके पास गरल हो

उसको क्या जो दंतहीन

विषरहित, विनीत, सरल हो ।



तीन दिवस तक पंथ मांगते

रघुपति सिन्धु किनारे,

बैठे पढ़ते रहे छन्द

अनुनय के प्यारे-प्यारे ।



उत्तर में जब एक नाद भी

उठा नहीं सागर से

उठी अधीर धधक पौरुष की

आग राम के शर से ।



सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि

करता आ गिरा शरण में

चरण पूज दासता ग्रहण की

बँधा मूढ़ बन्धन में।



सच पूछो , तो शर में ही

बसती है दीप्ति विनय की

सन्धि-वचन संपूज्य उसी का

जिसमें शक्ति विजय की ।



सहनशीलता, क्षमा, दया को

तभी पूजता जग है

बल का दर्प चमकता उसके

पीछे जब जगमग है।


अज्ञात

चारु चंद्र की चंचल किरणें- अज्ञात

चारु चंद्र की चंचल किरणें,


खेल रहीं थीं जल थल में।

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी,

अवनि और अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती थी धरती,

हरित तृणों की नोकों से।

मानो झूम रहे हों तरु भी,

मन्द पवन के झोंकों से।



पंचवटी की छाया में है,

सुन्दर पर्ण कुटीर बना।

जिसके बाहर स्वच्छ शिला पर,

धीर वीर निर्भीक मना।

जाग रहा है कौन धनुर्धर,

जब कि भुवन भर सोता है।

भोगी अनुगामी योगी सा,

बना दृष्टिगत होता है।



बना हुआ है प्रहरी जिसका,

उस कुटिया में क्या धन है।

जिसकी सेवा में रत इसका,

तन है, मन है, जीवन है।



अज्ञात

कारवाँ गुज़र गया गोपालदास नीरज

कारवाँ गुज़र गया







स्वप्न झरे फूल से,


मीत चुभे शूल से,


लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,


और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।


कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!






नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,


पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,


पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,


चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,


गीत अश्क बन गए,


छंद हो दफन गए,


साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,


और हम झुकेझुके,


मोड़ पर रुकेरुके


उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।


कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।






क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,


क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,


इस तरफ ज़मीन उठी तो आसमान उधर उठा,


थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,


एक दिन मगर यहाँ,


ऐसी कुछ हवा चली,


लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,


और हम लुटेलुटे,


वक्त से पिटेपिटे,


साँस की शराब का खुमार देखते रहे।


कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।






हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,


होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,


दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,


और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,


हो सका न कुछ मगर,


शाम बन गई सहर,


वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,


और हम डरेडरे,


नीर नयन में भरे,


ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।


कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!






माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,


ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,


शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,


गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,


पर तभी ज़हर भरी,


गाज एक वह गिरी,


पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,


और हम अजानसे,


दूर के मकान से,


पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।


कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।






- गोपालदास नीरज






यह कदम्ब का पेड़ ! -सुभद्रा कुमारी चौहान

यह कदम्ब का पेड़ !







यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।


मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।


ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।


किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।


तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।


उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।


वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।


अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।


बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।


माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।


तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।


ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।


तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।


और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।


तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।


जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।


इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।


यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।






-सुभद्रा कुमारी चौहान






ठुकरा दो या प्यार करो - सुभद्रा कुमारी चौहान

ठुकरा दो या प्यार करो







देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं।


सेवा में बहुमुल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं॥






धूमधाम से साजबाज से वे मंदिर में आते हैं।


मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं॥






मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी।


फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी॥






धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं।


हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं॥






कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं।


मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं॥






नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी।


पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ! चली आयी॥






पूजा और पुजापा प्रभुवर! इसी पुजारिन को समझो।


दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो॥






मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ।


जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ॥






चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो।


यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो॥






- सुभद्रा कुमारी चौहान






आशा का दीपक -दिनकर

आशा का दीपक



वह प्रदीप जो दीख रहा हइ झिलमिल, दूर नहीं है;


थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।






चिनगारी बन गयी लहू की बूँद जो पग से;


चमक रहे, पीछे मुड़ देखो, चरण-चिन्ह जगमग से।


शुरू हुई आराध्य-भुमि यह, क्लान्ति नहीं रे राही;


और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने दगमग से?


बाकी होश तभी तक जब तक जलता तूर नहीं है;


थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।






अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,


सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।


एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;


वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।


आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;


थककर बाइठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।






दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,


लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।


जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,


अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।


और अधिक ले जाँच, देवता इतन क्रूर नहीं है।


थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।






-दिनकर






जो भरा नहीं है भावों से,  बहती जिसमे रसधार नहीं | वो ह्रदय नहीं वह पत्थर है, जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं |

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

वह नगरी जिसकी पहचान सात वार और नौ त्यौहारों से होती  है, वह नगरी जिसे महाश्मशान के नाम से जाना जाता है, विश्वनाथ के रूप में जहाँ स्वयं त्रिनेत्रधारी भगवान भोले शंकर निवास करते है और जो सर्व शिक्षास्थली के रूप में विश्व भर में जानी  जाती है- उस पावन शिव की नगरी कि पहचान वाराणसी अर्थात काशी के रूप में होती है| भारत की आध्यात्मिक राजधानी के रूप में काशी की पहचान होती है, यह नगरी हम सभी भारतीयों के मन मंदिर में रची बसी है|  भारत के महानतम वैज्ञानिको में एक डॉ शांति स्वरुप भटनागर ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलगीत के माध्यम से संपूर्ण काशी नगरी की ही व्याख्या कर दी है| उनके शब्दों में

मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।
यह तीन लोकों से न्यारी काशी । सुज्ञान धर्म और सत्यराशी ।।
बसी है गंगा के रम्य तट पर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।.........
यहाँ की है यह पवित्र शिक्षा । कि सत्य पहले फिर आत्मरक्षा ।।
बिके हरिश्चन्द्र थे यहीं पर, यह सत्यशिक्षा की राजधानी ।.............
यह मुक्तिपद को दिलाने वाले ।सुधर्म पथ पर चलाने वाले ।।
यहीं फले फूले बुद्ध शंकर, यह राजॠषियों की राजधानी ।............
सुरम्य धारायें वरुणा अस्सी ।, नहायें जिनमें कबीर तुलसी ।।
भला हो कविता का क्यों न आकर, यह वाक्विद्या की राजधानी ।..........


गंगा के सुरम्य तट पर अवस्थित घाट हो या मंदिरों में घंटों की मनोरम ध्वनि  , ॐ नमः शिवाय के उद्घोष के साथ पूर्व दिशा में उदयाचलगामी   भगवान भास्कर को जल अर्पित इस नगरी की सुबह होती है| ब्रह्ममुहूर्त से गोधूली तक ऐसा प्रतीत होता है की संपूर्ण काशी नगरी भक्ति भाव से परिपूर्ण हो एक अभिनव जीवन के प्रारंभ होने का सन्देश देती है | निष्काम, निष्कपट, एवं निश्छल गंगा की अविरल धारा सृजन, संबल, और सौहादर्य के साथ जीने की सीख देते हुए सतत आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है | जीवन सतत चलने का नाम है,  इस भावना से ओत प्रोत काशी नगरी प्राचीन काल से आज तक हमारे आध्यात्मिक सोच को सदैव एक नयी दिशा देती आ रही है |

काशी   की सुबह की अपनी ही महत्ता है | एक ऐसी नगरी जहाँ गंगा के पश्चिमी तट पर खड़े हो पूर्व में उदीयमान भगवान आदित्य का जलाभिषेक परम पावनी गंगा जल से किया जाता है | अतः कहा जा सकता है कि प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति, साधना, एवं शिक्षा के ध्रुव के रूप में काशी का अपना एक मूर्धन्य स्थान रहा है |

पंडित विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में " ऐसा कोई भी समय नहीं आएगा कि काशी में कोई मूर्धन्य साधक न हो, मूर्धन्य विद्वान न हो, मूर्धन्य कलाकार न हो, मूर्धन्य रचनाकार न हो, मूर्धन्य वंचक न हो, मूर्धन्य पाखंडी न हो, मूर्धन्य अवधूत न हो, मूर्धन्य जौहरी न हो- ऐसे मूर्धन्य व्यक्तियों की श्रृंखला ही वस्तुतः काशी है |

वास्तव में काशी ओर गंगा सदियों से ही भारतीय परम्पराओं की वाहिनी रही है | 

काशी की भौगोलिक स्थिति 

काशी अर्थात वाराणसी नगरी भारत के उत्तेर प्रदेश राज्य के पूर्वी छोर पर बसा है | सामान्यतया पूर्वांचल के केंद्र में स्थित काशी नगरी पर पड़ोसी राज्य बिहार का प्रभाव सुस्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है | गंगा के उत्तरी तट पर अर्धचन्द्राकार रूप में बसा यह शहर २५'१८' उतरी आकांश एवम ८३'१' पूर्वी देशांतर पर सिथ्थ है १ इस नगरी से करीब १३० किलोमीटर पर सिथत इलाहाबाद (प्रयाग ) से भारतीय मानक समय रेखा गुजरती है, जिससे यह स्वत: ही सिद्ध हो जाता है सम्पूर्ण भारतीय समय पद्धति  पर इस  नगरी का कितना प्रभाव है |


परम पावनी गंगा के तट पर बसी काशी नगरी में गंगा की अपनी एक भौगोलिक विशेषता है| कहा जाता है की काशी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है| काशी में गंगा का बहाव दक्षिण से उत्तर की ओर है| इसी कारण यहाँ की गंगा को उत्तरवाहिनी गंगा के नाम से भी जाना जाता है| सामान्यतया गंगा नदी में जल का प्रवाह उत्तर पश्चिम हिमालय से दक्षिण पूर्व बंगाल की खाड़ी की ओर होता है| चूँकि काशी में इसका प्रभाव विपरीत दिशा में है, अत: यह काफी धीमा है और इस कारण दैनिक उपयोग हेतू यहाँ पानी हमेशा बना रहता है | काशी ही एक मात्र ऐसी नगरी है जिसकी सीढ़ियों से गंगा  कभी भी नहीं हटी है जबकि अन्य शहरों में नदियों द्वारा अपना रास्ता बदलते रहने से वे दूर हटती जा रही है |


काशी नगरी तीन और से नदियों से धिरी है जिससे यह प्रतीत होता है की स्वयं प्रकृति ने इस अदभुत नगरी की किलेबंदी कर राखी है | नगर का पूर्वी भाग गंगा नदी, उत्तरी भाग वरुणा नदी एवं दक्षिणी भाग अस्सी नदी से धीर हुआ है | काशी की एक और विशेषता है की यहाँ गंगा का बहाव वलयाकार है | यदि कोई नदी वलयाकार अथवा सर्पिलाकार रूप में प्रवाहित होती है तो उसके तटों पर बसे शहरो में प्राय: जल संकट का सामना नहीं करना पड़ता है | इसके विपरीत यदि नदियाँ सीधी बहती है तो समय के साथ साथ वह नदी नगर/ शहर से क्रमश: दूर होती जाती है और फलस्वरूप कुछ वर्षो पश्चात् उस नगर/ शहर में जल संकट का सामना करना पर सकता है | काशी इस दृष्टिकोण से एक भाग्यशाली नगरी है | काशी में गंगा का बहाव देखा जाय तो हम पते है की यहाँ मिर्जापुर की ओर से अति गंगा की धारा सर्वप्रथम रामनगर के पूर्वी किनारों से टकराती है ओर फिर उलट कर वाराणसी के घाटों से टकराती है |


दर्शनीय स्थल 


१. काशी  विश्वनाथ मंदिर (गौदोलिया): वारानाशी (जिसे भारत की संस्कर्ती राजधानी की भी संज्ञा दी जाती है ) मे स्थित शिव के द्रव्दाश जयोतिर्लिंगो में एक गंगा के पशिचमी तट के द्शास्व्मेध घाट के तट पर अव्शिथ्त विस्वनाथ मंदिर को भगवान भोले  शंकर की निवाश स्थली मन गता है 1  काशी विस्वनाथ मंदिर लाखो - करोडो भारतीयों के शारदा एवं विश्वास का एक अनुपम स्थल है एवं भारत के पवित्रतम मंदिरों में एक है 1 काशी विस्वनाथ ज्योर्तिलिंग का दर्शन अन्य काशी विस्वनाथ ज्योर्तिलिंग का दर्शन अन्य सभी  ज्योर्तिलिंग की अपेछा अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है | काशी विस्वनाथ मंदिर सांस्कृतिक परम्पराओ एवं उच्चतम अध्यात्मिक मूल्यों का कालांतर से एक जीवंत दृश्य दर्शाता है 1 काशी  विश्वनाथ के वर्तमान मोजूद मंदिर का पुनरोहन इन्दोर की महारानी अहिल्याबाई होलकर  ने १७८० में कराया था १ १८३९ में पंजाब के शासक रंजित सिंह ने इस मंदिर के गुम्बजो को सोने से अलंकृत करवाया | यह मंदिर प्रात:२.३० बजे मंगल आरती के लिए खोला जाता है तथा प्रात: ३.०० से ४.०० बजे के दौरान टिकेट के साथ दर्शक आरती में शामिल हो सकते है | बाबा विश्वनाथ के दर्शन का सामान्य समय ११.३० से १२.०० बजे तक है | ११.३० से १२.०० बजे मध्यान भोग आरती हेतू मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है और पुन: १२-७ बजे सांय  काल तक यहाँ दर्शन किये जा सकते है | संध्या ७-८.३० तक saptarishi आरती होती है | और पुन: ८.३०-९.०० बजे तक जनता दर्शन कर सकती है | ९ बजे श्रृंगार  भोग आरती प्रारंभ होती है और ११ बजे मंदिर के कपट बंद हो जाते है |


अन्नपूर्णा  मंदिर :     काशी विश्वनाथ मंदिर के निकट ही माता अन्नपूर्णा का भव्य मंदिर है | यह मंदिर भी काशी के महत्वपूर्ण मंदिरों में एक है | अक्षय तृतीया (परशुराम जयंती) को इस मंदिर में श्रद्धालु भक्तो की अपार भीड़ माता के दर्शन हेतू लगी रहती है | ऐसी मान्यता है की माता की कृपा जिस पर हो जाती है उसके घर का अन्न भंधर कदापि खली नहीं होता है |


कल भैरव मंदिर (विशेश्वरगंज): काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग १.६ किमी उत्तर में काल भैरव का अति प्राचीन मंदिर भी दर्शनीय है | काल भैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है | ऐसी मान्यता है की बाबा विश्वनाथ के दर्शन पूर्व काल भैरव से अनुमति लेनी आवश्यक है |


संकट मोचन मंदिर (लंका के निकट): राम भक्त हनुमान जी का यह मंदिर सोलहवी शताब्दी में तुलसीदास द्वारा स्थापित किया गया | वाराणसी के दक्षिणी भाग में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निकट अवस्थित इस मंदिर के बारे में यह कहा जाता है की जो यहाँ सच्चे मन से प्राथना करता है, उसकी प्राथना अवश्य ही पूरी होती है | प्रत्येक मंगलवार  एवं शनिवार को यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालुओ की भीड़ उमड़ पड़ती है | ऐसी मान्यता है की जो मनुष्य शनि के कोप से पीड़ित है, वह संकटमोचन मंदिर जाकर अवश्य ही ठीक हो जाता है | इस मंदिर की एक विशेषता है की यहाँ हमुमान एवं राम की प्रतिमा आमने सामने है |


दुर्गा मंदिर एवं दुर्गा कुण्ड: वाराणसी में स्थित दुर्गामंदिर यहाँ के प्राचीन मंदिरों में एक है जो नगर शैली में निर्मित है | शिखरों से सुशोभित लाल रंग में यह मंदिर अपनी प्राचीनता का एहसास कराती है |यह मंदिर एक आयताकार कुण्ड के पास अवस्थित है, जिसे दुर्गा कुण्ड कहा जाता है | पुरानो में ऐसी मान्यता है की देवी दुर्गा यहाँ निवास करती थी तथा इस पवित्र शहर की रक्षा करती थी | यह भी कहा जाता है की माँ की वर्त्तमान प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई है | नवरात्रों के समय इस मंदिर की शोभा बहुत निराली होती है |


तुलसी मानस मंदिर : दुर्गा मंदिर के आसन्न में अवस्थित तुलसी मानस मंदिर भगवान राम को समर्पित है |  इस मंदिर की सबसे खास विशेषता है कि इस मंदिर के दीवारों पर संपूर्ण रामचरित मानस उद्हरित है | श्वेत संगमरमरो से सुसज्जित इस मंदिर का निर्माण १९६४ में हुआ था | इस मंदिर कि वास्तुकला अपने आप में दर्शनीय है | ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण उसी स्थान पर किया गया है जहा तुलसी दास ने रामचरित मानस कि रचना की यह मंदिर प्रात: ५:३० से १२:०० तक तथा पुन: ३:३० से ९ बजे तक दर्शन हेतू खुला रहता है |
नया विश्वनाथ मंदिर :- काशी हिन्दू विश्व विधालय के बीचो विनय अवासिथ्त भगवान शिव के इस मंदिर को बिरला मंदिर भी कहा जाता है, जिसके सहायता से इस मंदिर का निर्माण करा गया है | नया विश्वनाथ मंदिर पुराने  विश्वनाथ मंदिर कि अनुकृति है | स्वेत संगमरमर के निर्मित इस मंदिर कि संकल्पना माननीय मदन मोहन मालवीय जी कि थी |
भारत माता मंदिर :- भारत माँ को सम्र्परित यह अपने आप में एक मात्र मंदिर है जो महात्मा गाँधी काशी विधापीठ के निकट है | इस मंदिर का निर्माण बाबु शिव प्रसाद गुप्त ने किया और इसका उद्घाटन १९३६ में महात्मा गाँधी द्वारा किया गया | भारत माँ के प्रतिमा अविभाज्य भारत, पर्वत सृख्लाओ , मैदानों एवं सागर की प्रतिक है |
कर्दमेश्वर मंदिर - पंचकोसी मार्ग, कंखा पर सिथ्त यह मंदिर गाहडवाल युग का एक मात्र सुरक्षित मंदिर है | यह  गाहडवाल मंदिर वास्तु का अप्रतिम साक्ष्य है |
काशी के प्रमुख पर्व / त्योहार :- वाराणसी भारतीय परम्पराओ 


मंगलवार, 14 सितंबर 2010

भारत की राजभाषा हिन्दी



भारत की राजभाषा हिन्दी 
हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में १४ सितम्बर, सन् १९४९ को स्वीकार किया गया। इसके बाद संविधान में राजभाषा के सम्बन्ध में धारा ३४३ से ३५२ तक की व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये १४ सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
धारा ३४३(१) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी एवं लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप (अर्थात 1, 2 , 3 आदि) होगा।
संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं । {संविधान का अनुच्छेद 120} किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है, यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए निदेशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

अनुच्छेद 343. संघ की राजभाषा

  1. संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।
  2. खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था :
परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।
  1. इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद् उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात्‌, विधि द्वारा
(क) अंग्रेजी भाषा का, या
(ख) अंकों के देवनागरी रूप का,
ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं।


अनुच्छेद 351. हिंदी भाषा के विकास के लिए निदेश

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।
आभार : हिंदी विकिपीडिया से चयनित अंश 
अंतरजाल पर भाषा वैभव के समस्त पाठकों को अजीत की ओर से हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 
अजीत 

बुधवार, 25 अगस्त 2010

कागज़

कागज़ 
जहाँ कोई नहीं होता 
दर्द बाटने के लिए 
जहाँ किसी को
कोई फर्क नहीं पड़ता 
किसी के गम से 
ऐसे में जरुरी है 
अपने आप ही 
आसुओ का बह जाना 
क्योकि जहर बन जाते आंसू 
जब दर्द की परत जमती है 
इसलिये, उससे पहले जरुरी  है 
दिल का हल्का होना 
कोरा कागज, मेरा साथी,
लो बोलने लगा,
दिल की आवाज को,
रोने लगा कागज भी,
दर्द की आवाज से,
कभी असफलताओ के दर्द से,
कभी निराशा की पीड़ा से,
बहुत सहनशील होते है,
ये कागज,
जो चुपचाप, सहज ही,
समेटते जाते है,
जिन्दगी की यादो को,
कभी सुनहरी, तो कभी पथरीली,
राहो का सहारा बनकर,
और उस हद तक साथ देते है,
जहाँ अपने सभी साथ छोड़ देते है,
तभी तो, मेरे-अपने,
अपने है ये कागज 

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

तुलसी जयंती पर विशेष

तुलसी जयंती पर विशेष 
(श्रावण सुक्ल सप्तमी)
धन्य... धन्य अति पावन राजा पुर की भूमि 
जिसकी रज ने संत - चरण रेखाएँ चूमी
भारतवर्ष विशाल धन्य, जहाँ जन्म लिया है
काशी स्थल है धन्य जहाँ गुण- मर्म पिया है
चरणों पे कुछ फूल चढ़ाऊ  साज सवारी
धन्य हो तुलसीदास जयंती आज तुम्हारी
भक्त शिरोमणि महाकवि जन-जन के प्यारे
भारतीय संस्कृति के जग-मग चाँद सितारे
तेरी प्रतिभा और साधना दय्न्य भाव ने
ज्ञान, भक्ति, अनुभूति, कला, गुण मय स्भाव ने 
आज जगा दी सात्विक श्रदा बुधि हमारी 
धन्य हो तुलसीदास... जयंती तुम्हारी 
जाति धर्म के दवेष अरु वातावरण विषैले
जो फैले सब और हुए जिनसे मन मैले
शैव-शाक्त-वैष्णव विरोध, जो फूट चुके थे
सूत्र एकता के, समान के.... टूट चुके थे
अमृत्मई वाणी से सबकी दशा सुधारी
धन्य हो तुलसीदास जयंती आज तुम्हारी
धन ओर यश के हेतू काव्य- रचनाए होती
(जो) सामजिक विदेवेश विषमता का विष बोती
(किन्तु) मानस ग्रन्थ अपूर्व लोक नायक तुलसी का
जिससे अमर हुआ सपूत माता हुलसी का
हुए सुबुध-सुशिक्षित भारत के नर नारी
धन्य हो तुलसीदस... जयंती आज तुम्हारी
दुर्दमनीय दानवो की स्वछंद लालसा
और विकराल, भयंकर उनका रूप कालसा
मुह-बाए दुर्दांत शक्तिया खड़ी सामने
सब कर दी निस्सार-क्षार तुलसी के राम ने
हिन्दू धर्म के रक्षक मानवता के पुजारी
धन्य हो तुलसीदास जयंती आज तुम्हारी
शेशव में अति अशुभ जान पोसा नहीं पाला
भाग्य-भाल बिनु पढ़े दिया था ग़ेह निकाला
दीन निरादर पात्र बने ये हमें स्मरण है
(तत्कालीन) ह्रदय हीन मानव समाज तेरा ह़ाए मरण है
रुद्रावतार हनुमंत्लाल ने ताव देह सवाँरी
धन्य हो तुलसीदास जयंती आज तुम्हारी 
तुम पावन गंगा सम शीतल उज्वल चन्द्र किरण से 
त्जेस्वी देदिम्यमान हो सूर्य किरण से 
नंदन वन में कल्पवृक्ष सम भारत में मानस है 
कौन गिराए हमें मार्ग से किसमे ये साहस है
'मानस' ने मानस में भर दी श्रीराम कथा अति प्यारी
धन्य हो तुलसीदास जयंती आज तुम्हारी
श्री भरत लाल के त्याग ने तेरे अंतर भाव दिखाए
लखनलाल की सेवाए में तेरे ही शुभ दर्शन पाए
रिपु सुदन की मूक साधना में भी तुम हो
श्रीराम के हर्ष-विषाद भाव समता में तुम हो
तेरी गाथा सदा रहे मुद मंगलकारी
श्रीराम जी की गाथा सदा रहे मंगलकारी
"धन्य हो तुलसीदास........... जयंती आज तुम्हारी"

                                                      रचियता
                                    आचर्य पंडित माधव प्रसाद शाश्त्री
                                   भूतपूर्व प्रशाशनिक अधिकारी
                                   देल्ही उच्च न्यालय

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

आस का मंदिर - अजीत कुमार झा

आस का मंदिर
प्रथम प्रस्फुटित नव किरण की आस में
बिखरी चांदनी के सहवास मे
धैर्य व विश्वास के साथ मे
एक नया कदम मंजिल की ओर बढायें
स्नेहीजनों का हाथ लेकर हाथ में  |

जैसे संवर जाती है तक़दीर शिल्पकार के हाथ से 
बंधकर अटककर टूटकर उड़ती है पतंग निश्चल भाव से 
रात जाती है इक नव प्रभात की आस में
जिन्दगी के अर्श पर मजबूरियों  के फर्श पर 
धैर्य कभी कम न हो मुश्किलों को देख कर
इक नया कदम बढ़ाएं अंधियारों को चीरकर |

अगर चाहते हो जीवन में सही दिशा का ज्ञान 
बन कर सारस नभ मे भरो उड़ान 
याद हमेशा रखना 'अजीत' कि यह वाणी 
कुछ तारो के टूटने से आसमान होता नहीं खाली |

भूत को बिसार के भविष्य को संवारें हम 
वर्तमान का कर उपयोग जीवन को बनाये हम
काँटों की सेज से पुष्प को चुन चले 
एक स्वाति कि बूंद से मन को तृप्त करे 
याद रखे हमेशा  यह,  आनंद यात्रा में है
गंतव्य पहुचने में नहीं,
हमारा कर्तव्य कर्म करने में है फल की चाह मे नहीं

मन मे उजियारा भर, आस का मंदिर बनायें
सहज सरल इस जीवन में उच्च विचार फैलाए 
मनुज मनुज में हो प्यार फैले सुगंध संसार 
आओ मिल जुल कर इस जहाँ को स्वर्ग बनायें |

अजीत कुमार झा



 

शनिवार, 13 मार्च 2010

मोम का उत्तर

जलती हुई बत्ती ने एक दिन मोम से पूछा कि एक बात बताओ - जल तो मै रही हूँ, तुम क्यों पिघल रहे हो तो मोम ने जबाब दिया कि जिसे मैंने अपने आप में बसा रखा है उसे जलते देख कार दुःख तो होगा ही |

गुरुवार, 11 मार्च 2010

फिर क्या होगा उसके बाद ?- बालकृष्ण राव

फिर  क्या  होगा   उसके  बाद ?
उत्सुक  हो  कार  शिशु  ने  पूछा,
'माँ , क्या  होगा  उसके  बाद ??'

रवि  से  उज्जवल , शशि  से  सुन्दर 
नव -किसलय  दल  से  कोमलतर 
वधु  तुम्हारे  घर  आएगी 
उस  विवाह  उत्सव  के  बाद
पल  भर  मुख  पर  स्मृति रेखा 
खेल  गयी  फिर  माँ  ने  देखा 

फिर  नभ  से  नक्षत्र  मनोहर 
स्वर्ग  लोक  से  उतर  उतर  कर
तेरे  शिशु  बनने     को  मेरे 
घर  आयेंगे  उसके  बाद

मेरे  नए  खिलौने  लेकर  
चले  न  जाएँ  वे  अपने  घर
चिंतित  हो  कर  उठा , किन्तु  फिर
पूछा  शिशु  ने  उसके  बाद  ?

अब  माँ  का  जी  ऊब  चुका  था
हर्ष  श्रांति  में  डूब  चुका  था
बोली  फिर  मै  बूढी  हो  कर
मर  जाऊंगी  उसके  बाद  

ये  सुन  कर  भर  आये  लोचन 
किन्तु  पोंछ  कर   उन्हें  उसी  क्षण 
सहज  कौतुहल  से  फिर  शिशु  ने  पूछा ,
माँ  क्या  होगा  उसके  बाद

कवि  को  बालक  ने  सिखलाया 
सुख  दुःख  है  पल  भर  की  माया 
है  अनंत  तत्व   का  प्रश्न  ये 
फिर  क्या  होगा  उसके  बाद ...??  

मंगलवार, 9 मार्च 2010

विष्णु स्तुति

शांताकारम भुजगशयनम पद्यनाभम् सुरेशम् । विश्‍वाधारं गगन सदृसं मेघवर्णम् शुभांगम् ।

लक्ष्मीकांतम् कमलनयनम् योगीभर्ध्यानगम्यम । वंदे विष्णूम भवभयहरम सर्वलोकैय नाथम ॥

सरस्वती वंदना

या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रव्रिता

या वीणा वर दंडमंडित करा या श्वेत पद्मासना
या ब्रह्मच्युत शंकर प्रभिती  देवी सदा वन्दिता
सा माम  पातु सरस्वती भगवती निशेश्य जाड्या पहा

शनिवार, 6 मार्च 2010

छायाचित्र

१२ फरवरी २०१० को रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन के डेसीडॉक प्रयोगशाला  द्वारा आयोजित अखिल भारतीय वैज्ञानिक एवं तकनीकी संगोष्टी में प्रस्तुत आलेख " हिंदी के जन भाषा से विश्व भाषा की ओर बढते कदम" के कुछ छायाचित्र 


सोमवार, 1 मार्च 2010

सादे रंग को गलती से आप ना कोरा समझो,

इसी में समाये इन्द्रधनुषी सातों रंग,

जो दिखे आपको ज़िन्दगी सादगी भरी किसी की,

तो आप यूँ समझो सतरंगी है दुनिया उसीकी,

होली आई सतरंगी रंगों की बौछार लायी,

ढेर सारी  मिठाई और मीठा मीठा प्यार लायी,

आप की ज़िन्दगी हो मीठे प्यार और खुशियों से भरी,

जिसमे समाये सातों रंग यही शुभकामना है हमारी

अजीत

होली है

जीवन में रंगों के मायने

मानव जीवन प्रकृति की दी गयी अनमोल देन है और हमारा संपूर्ण जीवन विभिन्न रंगों के परस्पर सामंजस्य से सराबोर होता है | होली एक ऐसा ही त्यौहार है जिसमे मानव जीवन के विभिन्न रंगों का समवेश होता है और प्रत्येक रंग अपने अर्थ की व्याख्या करते है |
रंगों को धारण करना वास्तव में प्रकृति से जुड़ना है |
पीला और वसंती रंग एक ओर जहाँ हमें वसंत के फूलो से तदात्य्म बनाने में सहायक होता है तो हरा रंग हरी हरी पत्तियों से | नीला रंग आसमान का प्रतिक होता है तो लाल रंग सुबह शाम की लालिमा को दर्शाता है |

होली की शुभकामनाये
अजीत झा

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

जिस मिट्टी में जीवा पाया जहाँ की धूल में बचपन फूल की भांति खिलता रहा जिस वातावरण और सुगंध   ने मन को अब तक नीरस नहीं होने दिया उसे कैसे भुलाया जा सकता है | अतीत को भूलना कठिन है | जो लोग उसे भूल जाते है उनका वर्त्तमान एवं भविष्य भी कुछ नहीं रह जाता | इस तरह के लोग जीवन में कुछ भी नहीं कर  सकते | अपने देश धर्म से बिछुड़ा हुआ आदमी केवल जीवित रह सकता है।
अजीत झा    

श्रेठ मनुज- अजीत कुमार झा

यह जीवन एक समर है
द्वन्द हमेशा हर पल घेरे रखता है
नर पुगंव वह जो मार द्वन्द को स्वार्थ रहित हो
जन जन के कल्याणों में जीता है
निजता का बोध दर्प भाव मिथ्या अहंकार को
मिटा मिटा निर्विकार न्याय हेतू
जो नर पुगंव जीता है
शास्त्रों ने उसका ही यश गया है
श्रेठ मनुज वो ही कहलाया है

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

जिंदगी जब तक रहेगी फुर्सत ना मिलेगी काम से !

कुछ तो समय ऐसा निकालो प्यार करो भगवान् से

सफलता

जहाँ एकता और एकाग्रता के शक्ति है
वहा सफलता सहज प्राप्त होती है

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

मनुष्यता - मैथिली शरण गुप्त

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,

मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।

हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,

मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।



यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।



उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,

उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।

उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,

तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।



अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।



सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है वही,

वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।

विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,

विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?



अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,

वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।



अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,

समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।

परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी,

अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।



रहो न यों कि एक से न काम और का सरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।



"मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है,

पुराण पुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।

फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है,

परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।



अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।



चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,

विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।

घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,

अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।



तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

नर हो न निराश करो मन को- मैथिली शरण गुप्त

नर हो न निराश करो मन को


कुछ काम करो कुछ काम करो

जग में रह के निज नाम करो।



यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो!

समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।

कुछ तो उपयुक्त करो तन को

नर हो न निराश करो मन को।



सँभलो कि सुयोग न जाए चला

कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला!

समझो जग को न निरा सपना

पथ आप प्रशस्त करो अपना।

अखिलेश्वर है अवलम्बन को

नर हो न निराश करो मन को।।



जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ

फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ!

तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो

उठ के अमरत्व विधान करो।

दवरूप रहो भव कानन को

नर हो न निराश करो मन को।।



निज गौरव का नित ज्ञान रहे

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।

सब जाय अभी पर मान रहे

मरणोत्तर गुंजित गान रहे।

कुछ हो न तजो निज साधन को

नर हो न निराश करो मन को।।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

अगर कोई आपका दिल दुखाये तो उसका बुरा मत मानना

क्यूकि यह कुदरत का नियम है की जिस पेड़ पर सबसे ज्यादा मीठे फल होते है

उसीको को ज्यादा पत्थर लगते है

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

ज़िन्दगी

जिंदगी के सफ़र में हर इन्सान

खुसी की तलाश में रहता हैं

इस बझे से वोह अनजाने में

हज़ार गमो को अपनाता हैं

जीना है तो खुल कर जियो

खुसी और गम का हिसाब क्यों करते हो

जो मिले उसी को अपनी तकदीर समझो

फिर देखो गम कैसे खुसी में बदलता है

ज़िन्दगी

क्या है जिंदगी

देखो तो खवाब है जिंदगी

पढो तो किताब है जिंदगी

सुनो तो ज्ञान है जिंदगी

पर हस्ते रहो तो आसान है जिंदगी

विनम्रता से हर आदमी के साथ पेश आये

उनसे भी जो आप के प्रति रुखापन रखते है

वो इस लिए की वो अछे नहीं है

बल्कि इस लिए की आप अछे है

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

अधिक चीनी खाने से दिमागी गड़बड़ी पैदा हो सकती है
चूहों पर किए गए नए शोध बताते हैं कि चीनी का अधिक सेवन बढ़ती उम्र में मस्तिष्क संबंधी परेशानियों को जन्म दे सकता है।
बर्मिंघम के अलबामा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए शोध के दौरान 15 चूहों में से सात को पानी या अन्य पदार्थों के माध्यम से भारी मात्रा में चीनी दिया गया जबकि आठ को बिना चीनी के रखा गया। चीनी का सेवन करने वाले चूहों में मानसिक बीमारी अल्जाइमर के लक्षण पाए गए, जबकि चीनी का सेवन नहीं करने वाले चूहे सामान्य थे।
विज्ञान पत्रिका 'बायोलॉजिकल केमिस्ट्री' के ताजा अंक में प्रकाशित इस शोध से अधिक चीनी सेवन करने वाले लोगों में अल्जाइमर बीमारी के होने की आशंका बढ़ जाने की पुष्टि होती है।

हृदय रोगों से बचाव

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन आधार पर कहा है कि टमाटर का सेवन हृदय रोगों से बचाव में सहायक है।
इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों ने उन लोगों को टमाटर खाने या उसका रस पीने की सलाह दी है जिनके रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक है।
फिनलैंड के औलो विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने 20 से 49 की आयु वर्ग के 21 स्वंयसेवियों को इस अध्ययन में शामिल किया जिनका कोलेस्ट्रोल स्तर सामान्य था। इन लोगों के नाश्ते में टमाटर की मात्रा बढ़ाई गई जिसके बाद तीन सप्ताह के भीतर इनके 'लो डेनसिटी लाईपो प्रोटीन' (एलडीएल) स्तर में गिरावट दर्ज हुई।
स्वंयसेवियों के कोलेस्ट्रोल स्तर में छ: फीसदी की गिरावट दर्ज हुई और एलडीएल स्तर में 13 फीसदी की। 'न्यूट्रीशन' पत्रिका में छपे इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने लिखा ''जो बदलाव हमने देखे हैं वे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह असर केवल तीन हफ्तों में दिखाई दिया है।''

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

उलझा ही रहने दे मुझे मुकदर की तरह ये तेरी जुल्फ नहीं जो सवर जाएगी

लाखो तूफ़ान है सीने में फिर भी मुस्काना पड़ता है
बेठे है मफिल में फिर भी हर राज छिपाना पड़ता है