प्रेरक
व्यक्तित्व
युग पुरुष स्वामी विवेकानंद
अजीत कुमार झा ,पुस्तकालयाध्यक्ष

समय के चपल चरण
कभी विश्राम नहीं लेते है। निरन्तर गतिशीलता , परिवर्तनशीलता , उत्थान- पतन की
प्रक्रिया ही इसका स्वाभाव है, उच्चश्रृंखलता ही उसका यौवन, निर्माण ही
उसका स्मित ह्रास एवं विध्वंस ही कुटिलपन है। समय के इसी निरन्तर
प्रवाह के साथ विश्व की सभ्यताओ ने समय- समय पर युग पुरुषों को जन्म दिया।
इन युग पुरुषों ने कालांतर में विश्व सभ्यताओं और संस्कृति के
दूत की भूमिका का निर्वहन किया। कन्फ्यूशियस , पैगम्बर मुहम्मद, गुरुनानक देव, ईसा मसीह, महात्मा बुद्ध , तीर्थंकर महावीर, जरथुष्ट, दयानंद सरस्वती, चैतन्य महाप्रभु
आदि ऐसे ही युग पुरुष हुए जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व को अलौकिक प्रकाश की एक
नयी दिशा दी।
ऐसे ही
महापुरुषों में भारत माता के पावन धरती पर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में एक दिव्य मनीषी का
प्रादुर्भाव हुआ , जिसे सम्पूर्ण विश्व स्वामी विवेकानंद के नाम
से जानता है। स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने नैतिक,आध्यात्मिक एवं सामाजिक सुव्यवस्था को सुचारू रूप देकर
जन-कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।
स्वामी
विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 ईस्वी में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के एक अभिजात परिवार
में हुआ था। इनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त एवं माता भुवनेश्वरी देवी थी। विश्वनाथ दत्त एक प्रसिद्ध वकील थे और माँ एक अत्यंत ही सुरुचि संपन्न अभिजात महिला थी। विवेकानंद
के बचपन का नाम नरेंद्र दत्त था और लोग इन्हें प्यार से नरेन
कहते थे।
नरेंद्र का बचपन पिता के सानिंध्य एवं माता के
आध्यात्मिक विचारों से पोषित होता
रहा था। नरेंद्र बचपन से
ही अत्यंत प्रखर बुद्धिशाली, नटखट और फुर्तीला था। वह अध्ययन के साथ-साथ
खेलकूद एवं व्यायाम में भी अत्यन्त निपुण था। एक अद्भुत ग्राहय क्षमता एवं विलक्षण स्मरण शक्ति नरेंद्र
के अंदर थी, जो उसे सामान्य
बालकों से अलग बनाता
था। युवक नरेंद्र अत्यंत विचारशील थे । प्रमाण के बगैर केवल विश्वास के बल
पर वह किसी बात को स्वीकार नहीं करते थे । ईश्वर विषयक इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वह जगह - जगह
भटकते रहे, परन्तु कही भी
समाधान नहीं मिल पाया। अंततः वह निराश हो गए और उन्हें ऐसे प्रतीत होने लगा
कि ईश्वर केवल एक कोरी कल्पना है। जैसा की विदित है की जहाँ निराशा सभी रास्ते बंद कर देती है तो कहीं न कहीं आशा की एक किरण उस अँधेरे में
प्रकाश को फैला देती है । ठीक इसी प्रकार जब नरेंद्र ईश्वर विषयक जिज्ञासाओं
का समाधान न पाकर ईश्वर को एक कोरी कल्पना मात्र मान बैठे ही थे , ठीक उसी समय नियति ने उनकी मुलाकात रामकृष्ण
परमहंस से करा दी। रामकृष्ण परमहंस का सानिंध्य उन्हें उसी प्रकार से तृप्त कर
दिया जिस प्रकार बंजर भूमि पर स्वाति की बूँद । नरेंद्र नाथ ने स्वामी परमहंस ने सीधे पूछा
कि " क्या आपने ईश्वर को देखा है। इस पर रामकृष्ण ने उन्हें हँसकर कहा
कि हाँ मैंने ईश्वर को देखा है ? और तुम्हे भी
ईश्वर का दर्शन करा सकता हूँ। रामकृष्ण के इस वक्तव्य से नरेंद्र इतने प्रभावित
हुए कि उन्हें अपना गुरु मान बैठे और लगभग ५ वर्षो तक उनके सानिंध्य में रहे।
तीव्र साधना के बल पर नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण से दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लिया।
इसी बीच, जब नरेंद्र लगभग २३ वर्ष के थे उसी समय श्री रामकृष्ण दिव्य समाधि में लीन हो गये। यह पल नरेन्द्रनाथ के लिए एक अत्यंत ही
व्यथित करने वाला पल था। परन्तु उन्होंने अपने आप को संभाला और रामकृष्ण परमहंस द्वारा
सौपे गये कार्य को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी का निर्वहन करने लगे। नरेंद्र
पहले ही गृह त्याग कर चुके थे। अब वे स्वामी विवेकानंद बन चुके थे और सम्पूर्ण देश में परिव्राजक बन भ्रमण करने निकले। उत्तर में हिमालय से
दक्षिण में कन्याकुमारी तक उन्होंने पैदल यात्रा की और देश की ज्वलंत समस्याओं का अनुभव किया।
सितम्बर 1893 में स्वामीजी सर्वधर्म सम्मेलन में भाग लेने
अमेरिका के शिकागो शहर पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपनी बात जिस तरह रखी वह
पश्चिम के लोगों के लिए एक नई अनुभूति थी। स्वामीजी का अमेरिकी लोगों को 'भाइयों और बहनों' शब्द का सम्बोधन ने सभी श्रोताओं का दिल जीत
लिया। स्वामीजी का यह संदेश नवजीवन और नवप्रेरणा का संदेश था। इसके बाद स्वामीजी ने
तर्क सहित भारतीय धर्म एवं दर्शनशास्त्र के विषय में बतलाया। अमेरिका से
स्वामीजी इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय देश गये और इस तरह उन्होंने प्राच्य एवं
पाश्चात्य सभ्यताओं एवं
संस्कृति को जोड़ने का भगीरथ प्रयास किया।
1897 में स्वामीजी
भारत लौटे। तब तक भारतीय समाचार पत्रों में स्वामीजी के नाम का डंका बजने लगा था।
उनके स्वागत के लिए जनता उमड़ पड़ी थी। लोगों को लगा कि शंकराचार्य का नया अवतार
स्वामीजी है। बाद में स्वामीजी ने देशवासियों को उस त्याग के महान आदर्श का
स्मरण कराया जो हमारा राष्ट्रीय ध्येय रहा है। उन्होंने यह स्पष्ट समझा दिया कि
अपनी विशाल और महान आध्यात्मिक संस्कृति के कारण भारत का अस्तित्व अमर
रहेगा। स्वामीजी के इस संजीवन संदेश से भारत "प्रबुद्ध भारत " बन
गया।
स्वामीजी यही
नहीं रुके बल्कि अपने इष्ट स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के संदेश को आगे बढ़ाने
के लिए उन्होंने बेलूर (कोलकाता के निकट ) में रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन की
स्थापना की जिसका उद्देश्य था - "आत्मनो मोक्षार्थ जगद्धिताय च" अर्थात "अपनी मुक्ति और संसार का कल्याण "।
चालीस वर्ष की अल्पायु में विवेकानंद
महासमाधि में लीं हो गए । परन्तु उन्होंने इतनी अल्पायु में जो रास्ता मानव कल्याण हेतु दिखा दिए वे
अमूल्य है। प्रत्येक जीव में एक अव्यक्त ब्रह्म को देखने वाले विवेकानंद ने
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही पहलू पर कार्य किए। स्वामीजी के
अमूल्य विचार मानव जीवन को हमेशा से
प्रकाशित करते रहेंगे।
स्वामी विवेकानंद के कुछ अमूल्य विचार निम्न
है : -
1) उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक तुम्हें लक्ष्य
की प्राप्ति न हो जाये।
2) नीति परायण बनो, साहसी बनो, धुन के पक्के बनो - तुम्हारे नैतिक
चरित्र में कहीं भी एक धब्बा तक न हो। मृत्यु से भी मुठभेड़ लेने की हिम्मत
रखों।
3)
अपने सामने
हमेशा एक आदर्श रख कर आगे बढ़ो। यदि आदर्श रखने वाला व्यक्ति हजार गलतियाँ
करता है तो मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि बिना आदर्श का मनुष्य 50 हजार गलतियाँ करेगा। चरित्र हमेशा
फलदायक होता है।
4)
विपरीत
परिस्थितियों को दबा देने के लिए जो वीरतापूर्वक प्रयत्न है, वहीं एक मात्र ऐसा है, जो हमारी आत्मा को ऊपर उठाता जाता है।
5) प्राचीन धर्मों में कहा गया है कि "वह
नास्तिक है, जो ईश्वर में
विश्वास नहीं करता। नया धर्म कहता है, “नास्तिक वह है जो स्वयं में विश्वास नहीं
करता”।
6) सारे पापों और बुराइयों की जड़ है - दुर्बलता।
समस्त असत कार्यों के पीछे वह दुर्बलता ही एकमात्र प्रेरकशक्ति है और यहीं
दुर्बलता स्वार्थपरता की जड़ है।
7) संसार कायरों के लिए नही है। भागने का
प्रयास मत करों। सफलता या असफलता की परवाह मत करो।
8) पैसे के व्यवहार में बिल्कुल निष्कलंक रहो। जब तक तुममे विश्वास, सच्चाई और निष्ठा है, तब प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति होती रहेगी।
यदि तुम अपने हृदय का खून बहाते हुए एवं दिन - रात कार्य करते रहो तो जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं रह जायेगा जो
तुम न कर सको।
9) प्रत्येक कर्म पवित्र है और भगवत पूजा का
सर्वोकृष्ट रुप है।